श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.17.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

उपहार्यैः सर्पजनैर्मासि मासीह यो बलिः।

वानस्पत्यो महाबाहो नागानां प्राङ् निरूपितः॥ २

upahāryaiḥ sarpajanairmāsi māsīha yo baliḥ|

vānaspatyo mahābāho nāgānāṃ prāṅ nirūpitaḥ|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवीजीने कहा—परीक्षित्! पूर्वकालमें गरुडजीको उपहार स्वरूप प्राप्त होनेवाले सर्पोंने यह नियम कर लिया था कि प्रत्येक मासमें निर्दिष्ट वृक्षके नीचे गरुडको एक सर्पकी भेंट दी जाय॥ २॥

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