इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना-अपना भाग देते रहते थे*॥ ३॥
स्वं स्वं भागं प्रयच्छन्ति नागाः पर्वणि पर्वणि।
गोपीथायात्मनः सर्वे सुपर्णाय महात्मने॥ ३
इस नियमके अनुसार प्रत्येक अमावस्याको सारे सर्प अपनी रक्षाके लिये महात्मा गरुडजीको अपना-अपना भाग देते रहते थे॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 249) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/3/
टिप्पणियाँ
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यह कथा इस प्रकार है—गरुडजीकी माता विनता और सर्पोंकी माता कद्रूमें परस्पर वैर था। माताका वैर स्मरण कर गरुडजी जो सर्प मिलता उसीको खा जाते। इससे व्याकुल होकर सब सर्प ब्रह्माजीकी शरणमें गये। तब ब्रह्माजीने यह नियम कर दिया कि प्रत्येक अमावास्याको प्रत्येक सर्पपरिवार बारी-बारीसे गरुडजीको एक सर्पकी बलि दिया करे।