उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया। यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे॥ ८॥
सुपर्णपक्षाभिहतः कालियोऽतीव विह्वलः।
ह्रदं विवेश कालिन्द्यास्तदगम्यं दुरासदम्॥ ८
उनके पंखकी चोटसे कालिय नाग घायल हो गया। वह घबड़ाकर वहाँसे भगा और यमुनाजीके इस कुण्डमें चला आया। यमुनाजीका यह कुण्ड गरुडके लिये अगम्य था। साथ ही वह इतना गहरा था कि उसमें दूसरे लोग भी नहीं जा सकते थे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 250) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/8/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)