श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तां वीक्ष्य कंसः प्रभयाजितान्तरां

विरोचयन्तीं भवनं शुचिस्मिताम्।

आहैष मे प्राणहरो हरिर्गुहां

ध्रुवं श्रितो यन्‍न पुरेयमीदृशी॥ २०

tāṃ vīkṣya kaṃsaḥ prabhayājitāntarāṃ

virocayantīṃ bhavanaṃ śucismitām|

āhaiṣa me prāṇaharo harirguhāṃ

dhruvaṃ śrito yanna pureyamīdṛśī|| 20

अर्थ

देवकीके गर्भमें भगवान् विराजमान हो गये थे। उसके मुखपर पवित्र मुसकान थी और उसके शरीरकी कान्तिसे बंदीगृह जगमगाने लगा था। जब कंसने उसे देखा, तब वह मन-ही-मन कहने लगा—‘अबकी बार मेरे प्राणोंके ग्राहक विष्णुने इसके गर्भमें अवश्य ही प्रवेश किया है; क्योंकि इसके पहले देवकी कभी ऐसी न थी॥ २०॥

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