॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.2.21
किमद्य तस्मिन् करणीयमाशु मे
यदर्थतन्त्रो न विहन्ति विक्रमम्।
स्त्रियाः स्वसुर्गुरुमत्या वधोऽयं
यशः श्रियं हन्त्यनुकालमायुः॥ २१
kimadya tasmin karaṇīyamāśu me
yadarthatantro na vihanti vikramam|
striyāḥ svasurgurumatyā vadho'yaṃ
yaśaḥ śriyaṃ hantyanukālamāyuḥ|| 21
अर्थ
अब इस विषयमें शीघ्र-से-शीघ्र मुझे क्या करना चाहिये? देवकीको मारना तो ठीक न होगा; क्योंकि वीर पुरुष स्वार्थवश अपने पराक्रमको कलंकित नहीं करते। एक तो यह स्त्री है, दूसरे बहिन और तीसरे गर्भवती है। इसको मारनेसे तो तत्काल ही मेरी कीर्ति, लक्ष्मी और आयु नष्ट हो जायगी॥ २१॥