श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

गिरयो वर्षधाराभिर्हन्यमाना न विव्यथुः।

अभिभूयमाना व्यसनैर्यथाधोक्षजचेतसः॥ १५

girayo varṣadhārābhirhanyamānā na vivyathuḥ|

abhibhūyamānā vyasanairyathādhokṣajacetasaḥ|| 15

अर्थ

मूसलधार वर्षाकी चोट खाते रहनेपर भी पर्वतोंको कोई व्यथा नहीं होती थी—जैसे दुःखोंकी भरमार होनेपर भी उन पुरुषोंको किसी प्रकारकी व्यथा नहीं होती, जिन्होंने अपना चित्त भगवान्‌को ही समर्पित कर रखा है॥ १५॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1664 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आदेशा-नुसार → आदेशानुसार

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