स्थैर्यं न चक्रुः कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव४॥ १७
lokabandhuṣu megheṣu vidyutaścalasauhṛdāḥ|
sthairyaṃ na cakruḥ kāminyaḥ puruṣeṣu guṇiṣviva|| 17
अर्थ
यद्यपि बादल बड़े लोकोपकारी हैं, फिर भी बिजलियाँ उनमें स्थिर नहीं रहतीं—ठीक वैसे ही, जैसे चपल अनुरागवाली कामिनी स्त्रियाँ गुणी पुरुषोंके पास भी स्थिरभावसे नहीं रहतीं॥ १७॥✎ 1664
लोकबन्धुषु मेघेषु विद्युतश्चलसौहृदाः।
स्थैर्यं न चक्रुः कामिन्यः पुरुषेषु गुणिष्विव॥ १७
यद्यपि बादल बड़े लोकोपकारी हैं, फिर भी बिजलियाँ उनमें स्थिर नहीं रहतीं—ठीक वैसे ही, जैसे चपल अनुरागवाली कामिनी स्त्रियाँ गुणी पुरुषोंके पास भी स्थिरभावसे नहीं रहतीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 260) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/20/17/