श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

जलौघैर्निरभिद्यन्त सेतवो वर्षतीश्‍वरे।

पाखण्डिनामसद्वादैर्वेदमार्गाः कलौ यथा॥ २३

jalaughairnirabhidyanta setavo varṣatīśvare|

pākhaṇḍināmasadvādairvedamārgāḥ kalau yathā|| 23

अर्थ

वर्षा ऋतुमें इन्द्रकी प्रेरणासे मूसलधार वर्षा होती है, इससे नदियोंके बाँध और खेतोंकी मेड़ें टूट-फूट जाती हैं—जैसे कलियुगमें पाखण्डियोंके तरह-तरहके मिथ्या मतवादोंसे वैदिक मार्गकी मर्यादा ढीली पड़ जाती है॥ २३॥✎ 1664

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
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