वायुकी प्रेरणासे घने बादल प्राणियोंके लिये अमृतमय जलकी वर्षा करने लगते हैं—जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे धनी लोग समय-समयपर दानके द्वारा प्रजाकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं॥ २४॥✎ 1664
व्यमुंचन् वायुभिर्नुन्ना भूतेभ्योऽथामृतं घनाः।
यथाऽऽशिषो विश्पतयः काले काले द्विजेरिताः॥ २४
वायुकी प्रेरणासे घने बादल प्राणियोंके लिये अमृतमय जलकी वर्षा करने लगते हैं—जैसे ब्राह्मणोंकी प्रेरणासे धनी लोग समय-समयपर दानके द्वारा प्रजाकी अभिलाषाएँ पूर्ण करते हैं॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 261) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/20/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)