श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

शाद्वलोपरि संविश्य चर्वतो मीलितेक्षणान्।

तृप्तान् वृषान् वत्सतरान् गाश्‍च स्वोधोभरश्रमाः॥ ३०

śādvalopari saṃviśya carvato mīlitekṣaṇān|

tṛptān vṛṣān vatsatarān gāśca svodhobharaśramāḥ|| 30

अर्थ

वर्षा ऋतुमें बैल, बछड़े और थनोंके भारी भारसे थकी हुई गौएँ थोड़ी ही देरमें भरपेट घास चर लेतीं और हरी-हरी घासपर बैठकर ही आँख मूँदकर जुगाली करती रहतीं। वर्षा ऋतुकी सुन्दरता अपार थी। वह सभी प्राणियोंको सुख पहुँचा रही थी। इसमें सन्देह नहीं कि वह ऋतु, गाय, बैल, बछड़े—सब-के-सब भगवान्‌की लीलाके ही विलास थे। फिर भी उन्हें देखकर भगवान् बहुत प्रसन्‍न होते और बार-बार उनकी प्रशंसा करते॥ ३०-३१॥

यह अर्थ श्लोक 30–31 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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