श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.20.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

शनैः शनैर्जहुः पङ्कं स्थलान्यामं च वीरुधः।

यथाहंममतां धीराः शरीरादिष्वनात्मसु॥ ३९

śanaiḥ śanairjahuḥ paṅkaṃ sthalānyāmaṃ ca vīrudhaḥ|

yathāhaṃmamatāṃ dhīrāḥ śarīrādiṣvanātmasu|| 39

अर्थ

पृथ्वी धीरे-धीरे अपना कीचड़ छोड़ने लगी और घास-पात धीरे-धीरे अपनी कचाई छोड़ने लगे—ठीक वैसे ही, जैसे विवेकसम्पन्‍न साधक धीरे-धीरे शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमेंसे ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ यह अहंता और ममता छोड़ देते हैं॥ ३९॥

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