śanaiḥ śanairjahuḥ paṅkaṃ sthalānyāmaṃ ca vīrudhaḥ|
yathāhaṃmamatāṃ dhīrāḥ śarīrādiṣvanātmasu|| 39
अर्थ
पृथ्वी धीरे-धीरे अपना कीचड़ छोड़ने लगी और घास-पात धीरे-धीरे अपनी कचाई छोड़ने लगे—ठीक वैसे ही, जैसे विवेकसम्पन्न साधक धीरे-धीरे शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमेंसे ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ यह अहंता और ममता छोड़ देते हैं॥ ३९॥
शनैः शनैर्जहुः पङ्कं स्थलान्यामं च वीरुधः।
यथाहंममतां धीराः शरीरादिष्वनात्मसु॥ ३९
पृथ्वी धीरे-धीरे अपना कीचड़ छोड़ने लगी और घास-पात धीरे-धीरे अपनी कचाई छोड़ने लगे—ठीक वैसे ही, जैसे विवेकसम्पन्न साधक धीरे-धीरे शरीर आदि अनात्म पदार्थोंमेंसे ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ यह अहंता और ममता छोड़ देते हैं॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.20.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 263) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/20/39/