॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.23.36
एवं लीलानरवपुर्नृलोकमनुशीलयन्।
रेमे गोगोपगोपीनां रमयन् रूपवाक्कृतैः॥ ३६
evaṃ līlānaravapurnṛlokamanuśīlayan|
reme gogopagopīnāṃ ramayan rūpavākkṛtaiḥ|| 36
अर्थ
परीक्षित्! इस प्रकार लीलामनुष्य भगवान् श्रीकृष्णने मनुष्यकी-सी लीला की और अपने सौन्दर्य, माधुर्य, वाणी तथा कर्मोंसे गौएँ, ग्वालबाल और गोपियोंको आनन्दित किया और स्वयं भी उनके अलौकिक प्रेमरसका आस्वादन करके आनन्दित हुए॥ ३६॥