श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

नासां द्विजातिसंस्कारो न निवासो गुरावपि।

न तपो नात्ममीमांसा न शौचं न क्रियाः शुभाः॥ ४२

nāsāṃ dvijātisaṃskāro na nivāso gurāvapi|

na tapo nātmamīmāṃsā na śaucaṃ na kriyāḥ śubhāḥ|| 42

अर्थ

इनके न तो द्विजातिके योग्य यज्ञोपवीत आदि संस्कार हुए हैं और न तो इन्होंने गुरुकुलमें ही निवास किया है। न इन्होंने तपस्या की है और न तो आत्माके सम्बन्धमें ही कुछ विवेक-विचार किया है। उनकी बात तो दूर रही, इनमें न तो पूरी पवित्रता है और न तो शुभकर्म ही॥ ४२॥

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