श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अथापि ह्युत्तमश्‍लोके कृष्णे योगेश्‍वरेश्‍वरे।

भक्तिर्दृढा न चास्माकं संस्कारादिमतामपि॥ ४३

athāpi hyuttamaśloke kṛṣṇe yogeśvareśvare|

bhaktirdṛḍhā na cāsmākaṃ saṃskārādimatāmapi|| 43

अर्थ

फिर भी समस्त योगेश्‍वरोंके ईश्‍वर पुण्यकीर्ति भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंमें इनका दृढ़ प्रेम है। और हमने अपने संस्कार किये हैं, गुरुकुलमें निवास किया है, तपस्या की है, आत्मानुसन्धान किया है, पवित्रताका निर्वाह किया है तथा अच्छे-अच्छे कर्म किये हैं; फिर भी भगवान्‌के चरणोंमें हमारा प्रेम नहीं है॥ ४३॥

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