श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.23.49

दशम स्कन्ध · अध्याय 23 · अथ त्रयोविंशोऽध्यायः

अहो१ वयं धन्यतमा येषां नस्तादृशीः स्त्रियः।

भक्त्या यासां मतिर्जाता अस्माकं निश्‍चला हरौ॥ ४९

aho vayaṃ dhanyatamā yeṣāṃ nastādṛśīḥ striyaḥ|

bhaktyā yāsāṃ matirjātā asmākaṃ niścalā harau|| 49

अर्थ

यह सब होनेपर भी हम धन्यातिधन्य हैं, हमारे अहोभाग्य हैं। तभी तो हमें वैसी पत्‍नियाँ प्राप्त हुई हैं। उनकी भक्तिसे हमारी बुद्धि भी भगवान् श्रीकृष्णके अविचल प्रेमसे युक्त हो गयी है॥ ४९॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्राचीन प्रतिमें ‘अहो वयं..’ से लेकर...........‘निश्‍चला हरौ’ तकका पाठ नहीं है।

    (मुद्रित पृष्ठ 288)

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