श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कालात्मा भगवान्की इच्छा थी कि इन्द्रका घमण्ड चूर-चूर कर दें। नन्दबाबा आदि गोपोंने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर ली॥ ३१॥✎ 2080
कालात्मना भगवता शक्रदर्पं जिघांसता।
प्रोक्तं निशम्य नन्दाद्याः साध्वगृह्णन्त तद्वचः॥ ३१
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कालात्मा भगवान्की इच्छा थी कि इन्द्रका घमण्ड चूर-चूर कर दें। नन्दबाबा आदि गोपोंने उनकी बात सुनकर बड़ी प्रसन्नतासे स्वीकार कर ली॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.24.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 292) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/24/31/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)