श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.24.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 24 · अथ चतुर्विंशोऽध्यायः

ज्ञात्वाज्ञात्वा च कर्माणि जनोऽयमनुतिष्ठति।

विदुषः कर्मसिद्धिः स्यात्तथा नाविदुषो भवेत्॥ ६

jñātvājñātvā ca karmāṇi jano'yamanutiṣṭhati|

viduṣaḥ karmasiddhiḥ syāttathā nāviduṣo bhavet|| 6

अर्थ

यह संसारी मनुष्य समझे-बेसमझे अनेकों प्रकारके कर्मोंका अनुष्ठान करता है। उनमेंसे समझ-बूझकर करनेवाले पुरुषोंके कर्म जैसे सफल होते हैं, वैसे बेसमझके नहीं॥ ६॥

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