श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

कृष्ण कृष्ण महाभाग त्वन्‍नाथं गोकुलं प्रभो।

त्रातुमर्हसि देवान्‍नः कुपिताद् भक्तवत्सल॥ १३

kṛṣṇa kṛṣṇa mahābhāga tvannāthaṃ gokulaṃ prabho|

trātumarhasi devānnaḥ kupitād bhaktavatsala|| 13

अर्थ

और बोले—‘प्यारे श्रीकृष्ण! तुम बड़े भाग्यवान् हो। अब तो कृष्ण! केवल तुम्हारे ही भाग्यसे हमारी रक्षा होगी। प्रभो! इस सारे गोकुलके एकमात्र स्वामी, एकमात्र रक्षक तुम्हीं हो। भक्तवत्सल! इन्द्रके क्रोधसे अब तुम्हीं हमारी रक्षा कर सकते हो’॥ १३॥✎ 2081 2082

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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