वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं॥ १५॥✎ 20812082
अपर्त्वत्युल्बणं वर्षमतिवातं शिलामयम्।
स्वयागे विहतेऽस्माभिरिन्द्रो नाशाय वर्षति॥ १५
वे मन-ही-मन कहने लगे—‘हमने इन्द्रका यज्ञ भंग कर दिया है, इसीसे वे व्रजका नाश करनेके लिये बिना ऋतुके ही यह प्रचण्ड वायु और ओलोंके साथ घनघोर वर्षा कर रहे हैं॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 295) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/25/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)