श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.25.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 25 · अथ पञ्चविंशोऽध्यायः

न हि सद्भावयुक्तानां सुराणामीशविस्मयः।

मत्तोऽसतां मानभंगः प्रशमायोपकल्पते॥ १७

na hi sadbhāvayuktānāṃ surāṇāmīśavismayaḥ|

matto'satāṃ mānabhaṃgaḥ praśamāyopakalpate|| 17

अर्थ

देवतालोग तो सत्त्वप्रधान होते हैं। इनमें अपने ऐश्‍वर्य और पदका अभिमान न होना चाहिये। अतः यह उचित ही है कि इन सत्त्वगुणसे च्युत दुष्ट देवताओंका मैं मान भंग कर दूँ। इससे अन्तमें उन्हें शान्ति ही मिलेगी॥ १७॥✎ 2081 2082

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #2081 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2082 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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