इन्द्रको अपने पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा—॥ २॥
गणं सांवर्तकं नाम मेघानां चान्तकारिणाम्।
इन्द्रः प्राचोदयत् क्रुद्धो वाक्यं चाहेशमान्युत॥ २
इन्द्रको अपने पदका बड़ा घमण्ड था, वे समझते थे कि मैं ही त्रिलोकीका ईश्वर हूँ। उन्होंने क्रोधसे तिलमिलाकर प्रलय करनेवाले मेघोंके सांवर्तक नामक गणको व्रजपर चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी और कहा—॥ २॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 293) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/25/2/