विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम्॥ ४
yathādṛḍhaiḥ karmamayaiḥ kratubhirnāmanaunibhaiḥ|
vidyāmānvīkṣikīṃ hitvā titīrṣanti bhavārṇavam|| 4
अर्थ
जैसे पृथ्वीपर बहुत-से मन्दबुद्धि पुरुष भवसागरसे पार जानेके सच्चे साधन ब्रह्मविद्याको तो छोड़ देते हैं और नाममात्रकी टूटी हुई नावसे—कर्ममय यज्ञोंसे इस घोर संसार-सागरको पार करना चाहते हैं॥ ४॥
यथादृढैः कर्ममयैः क्रतुभिर्नामनौनिभैः।
विद्यामान्वीक्षिकीं हित्वा तितीर्षन्ति भवार्णवम्॥ ४
जैसे पृथ्वीपर बहुत-से मन्दबुद्धि पुरुष भवसागरसे पार जानेके सच्चे साधन ब्रह्मविद्याको तो छोड़ देते हैं और नाममात्रकी टूटी हुई नावसे—कर्ममय यज्ञोंसे इस घोर संसार-सागरको पार करना चाहते हैं॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.25.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 294) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/25/4/