श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.26.13

दशम स्कन्ध · अध्याय 26 · अथ षड्विंशोऽध्यायः

दुस्त्यजश्‍चानुरागोऽस्मिन् सर्वेषां नो व्रजौकसाम्।

नन्द ते तनयेऽस्मासु तस्याप्यौत्पत्तिकः कथम्॥ १३

dustyajaścānurāgo'smin sarveṣāṃ no vrajaukasām|

nanda te tanaye'smāsu tasyāpyautpattikaḥ katham|| 13

अर्थ

नन्दजी! हम यह भी देखते हैं कि तुम्हारे इस साँवले बालकपर हम सभी व्रजवासियोंका अनन्त प्रेम है और इसका भी हमपर स्वाभाविक ही स्नेह है। क्या आप बतला सकते हैं कि इसका क्या कारण है॥ १३॥

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