यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित—अमृतमय बना दिया॥ १२॥
आशीविषतमाहीन्द्रं दमित्वा विमदं ह्रदात्।
प्रसह्योद्वास्य यमुनां चक्रेऽसौ निर्विषोदकाम्॥ १२
यमुनाजलमें रहनेवाला कालियनाग कितना विषैला था? परन्तु इसने उसका भी मान मर्दन कर उसे बलपूर्वक दहसे निकाल दिया और यमुनाजीका जल सदाके लिये विषरहित—अमृतमय बना दिया॥ १२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.26.12 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 299) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/26/12/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1153 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): हृदात्। → ह्रदात्।