श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.27.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 27 · अथ सप्तविंशोऽध्यायः

त्वं नः परमकं दैवं त्वं न इन्द्रो जगत्पते।

भवाय भव गोविप्रदेवानां ये च साधवः॥ २०

tvaṃ naḥ paramakaṃ daivaṃ tvaṃ na indro jagatpate|

bhavāya bhava govipradevānāṃ ye ca sādhavaḥ|| 20

अर्थ

आप जगत‍्के स्वामी हैं, परन्तु हमारे तो परम पूजनीय आराध्यदेव ही हैं। प्रभो! इन्द्र त्रिलोकीके इन्द्र हुआ करें, परन्तु हमारे इन्द्र तो आप ही हैं। अतः आप ही गौ, ब्राह्मण, देवता और साधुजनोंकी रक्षाके लिये हमारे इन्द्र बन जाइये॥ २०॥

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