नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये॥ २६॥
नानारसौघाः सरितो वृक्षा आसन् मधुस्रवाः।
अकृष्टपच्यौषधयो गिरयोऽबिभ्रदुन्मणीन्॥ २६
नदियोंमें विविध रसोंकी बाढ़ आ गयी। वृक्षोंसे मधुधारा बहने लगी। बिना जोते-बोये पृथ्वीमें अनेकों प्रकारकी ओषधियाँ, अन्न पैदा हो गये। पर्वतोंमें छिपे हुए मणि-माणिक्य स्वयं ही बाहर निकल आये॥ २६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.27.26 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 304) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/27/26/