श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

अथाष्टाविंशोऽध्यायः

वरुणलोकसे नन्दजीको छुड़ाकर लाना

श्रीशुक उवाच

एकादश्यां निराहारः समभ्यर्च्य जनार्दनम्।

स्नातुं नन्दस्तु कालिन्द्या द्वादश्यां जलमाविशत्॥ १

ekādaśyāṃ nirāhāraḥ samabhyarcya janārdanam|

snātuṃ nandastu kālindyā dvādaśyāṃ jalamāviśat|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबाने कार्तिक शुक्ल एकादशीका उपवास किया और भगवान्‌की पूजा की तथा उसी दिन रातमें द्वादशी लगनेपर स्नान करनेके लिये यमुना-जलमें प्रवेश किया॥ १॥✎ 886

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #886 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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