श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.28.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 28 · अथाष्टाविंशोऽध्यायः

प्राप्तं वीक्ष्य हृषीकेशं लोकपालः सपर्यया।

महत्या पूजयित्वाऽऽह तद्दर्शनमहोत्सवः॥ ४

prāptaṃ vīkṣya hṛṣīkeśaṃ lokapālaḥ saparyayā|

mahatyā pūjayitvā''ha taddarśanamahotsavaḥ|| 4

अर्थ

जब लोकपाल वरुणने देखा कि समस्त जगत‍्के अन्तरिन्द्रिय और बहिरिन्द्रियोंके प्रवर्तक भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही उनके यहाँ पधारे हैं, तब उन्होंने उनकी बहुत बड़ी पूजा की। भगवान्‌के दर्शनसे उनका रोम-रोम आनन्दसे खिल उठा। इसके बाद उन्होंने भगवान्‌से निवेदन किया॥ ४॥✎ 886

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #886 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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