श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

नृणां निःश्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवतो नृप।

अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणस्य गुणात्मनः॥ १४

nṛṇāṃ niḥśreyasārthāya vyaktirbhagavato nṛpa|

avyayasyāprameyasya nirguṇasya guṇātmanaḥ|| 14

अर्थ

परीक्षित्! वास्तवमें भगवान् प्रकृतिसम्बन्धी वृद्धि-विनाश, प्रमाण-प्रमेय और गुण-गुणीभावसे रहित हैं। वे अचिन्त्य अनन्त अप्राकृत परम कल्याणस्वरूप गुणोंके एकमात्र आश्रय हैं। उन्होंने यह जो अपनेको तथा अपनी लीलाको प्रकट किया है, उसका प्रयोजन केवल इतना ही है कि जीव उसके सहारे अपना परम कल्याण सम्पादन करे॥ १४॥✎ 887 888

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #887 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #888 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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