श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

कामं क्रोधं भयं स्नेहमैक्यं सौहृदमेव च।

नित्यं हरौ विदधतो यान्ति तन्मयतां हि ते॥ १५

kāmaṃ krodhaṃ bhayaṃ snehamaikyaṃ sauhṛdameva ca|

nityaṃ harau vidadhato yānti tanmayatāṃ hi te|| 15

अर्थ

इसलिये भगवान्‌से केवल सम्बन्ध हो जाना चाहिये। वह सम्बन्ध चाहे जैसा हो—कामका हो, क्रोधका हो या भयका हो; स्नेह, नातेदारी या सौहार्दका हो। चाहे जिस भावसे भगवान्‌में नित्य-निरन्तर अपनी वृत्तियाँ जोड़ दी जायँ, वे भगवान्‌से ही जुड़ती हैं। इसलिये वृत्तियाँ भगवन्मय हो जाती हैं और उस जीवको भगवान्‌की ही प्राप्ति होती है॥ १५॥✎ 887 888

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #887 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #888 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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