श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

ता दृष्ट्वान्तिकमायाता भगवान् व्रजयोषितः।

अवदद् वदतां श्रेष्ठो वाचः पेशैर्विमोहयन्॥ १७

tā dṛṣṭvāntikamāyātā bhagavān vrajayoṣitaḥ|

avadad vadatāṃ śreṣṭho vācaḥ peśairvimohayan|| 17

अर्थ

जब भगवान् श्रीकृष्णने देखा कि व्रजकी अनुपम विभूतियाँ गोपियाँ मेरे बिलकुल पास आ गयी हैं, तब उन्होंने अपनी विनोदभरी वाक्चातुरीसे उन्हें मोहित करते हुए कहा—क्यों न हो—भूत, भविष्य और वर्तमानकालके जितने वक्ता हैं, उनमें वे ही तो सर्वश्रेष्ठ हैं॥ १७॥✎ 887 888

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #887 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से
  • #888 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् से → भगवान्‌से

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