श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

श्रीभगवानुवाच

स्वागतं वो महाभागाः प्रियं किं करवाणि वः।

व्रजस्यानामयं कच्चिद् ब्रूतागमनकारणम्॥ १८

svāgataṃ vo mahābhāgāḥ priyaṃ kiṃ karavāṇi vaḥ|

vrajasyānāmayaṃ kaccid brūtāgamanakāraṇam|| 18

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—महाभाग्यवती गोपियो! तुम्हारा स्वागत है। बतलाओ, तुम्हें प्रसन्‍न करनेके लिये मैं कौन-सा काम करूँ? व्रजमें तो सब कुशल-मंगल है न? कहो, इस समय यहाँ आनेकी क्या आवश्यकता पड़ गयी?॥ १८॥✎ 1818

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1818 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): सेवा → और सतियोंकी सेवा

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