श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.29.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 29 · अथैकोनत्रिंशोऽध्यायः

का स्त्र्यङ्ग ते कलपदायतमूर्च्छितेन ✎ 2086

सम्मोहिताऽऽर्यचरितान्‍न चलेत्त्रिलोक्याम्।

त्रैलोक्यसौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं

यद् गोद्विजद्रुममृगाः पुलकान्यबिभ्रन्॥ ४०

kā stryaṅga te kalapadāyatamūrcchitena

sammohitā''ryacaritānna calettrilokyām|

trailokyasaubhagamidaṃ ca nirīkṣya rūpaṃ

yad godvijadrumamṛgāḥ pulakānyabibhran|| 40

अर्थ

प्यारे श्यामसुन्दर! तीनों लोकोंमें भी और ऐसी कौन-सी स्त्री है, जो मधुर-मधुर पद और आरोह-अवरोह-क्रमसे विविध प्रकारकी मूर्च्छनाओंसे युक्त तुम्हारी वंशीकी तान सुनकर तथा इस त्रिलोकसुन्दर मोहिनी मूर्तिको—जो अपने एक बूँद सौन्दर्यसे त्रिलोकीको सौन्दर्यका दान करती है एवं जिसे देखकर गौ, पक्षी, वृक्ष और हरिन भी रोमांचित, पुलकित हो जाते हैं—अपने नेत्रोंसे निहारकर आर्य—मर्यादासे विचलित न हो जाय, कुल-कान और लोकलज्जाको त्यागकर तुममें अनुरक्त न हो जाय॥ ४०॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2086 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): स्त्रॺङ्ग → स्त्र्यङ्ग

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