॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.29.41
व्यक्तं भवान् व्रजभयार्तिहरोऽभिजातो
देवो यथाऽऽदिपुरुषः सुरलोकगोप्ता।
तन्नो निधेहि करपंकजमार्तबन्धो
तप्तस्तनेषु च शिरस्सु च किंकरीणाम्॥ ४१
vyaktaṃ bhavān vrajabhayārtiharo'bhijāto
devo yathā''dipuruṣaḥ suralokagoptā|
tanno nidhehi karapaṃkajamārtabandho
taptastaneṣu ca śirassu ca kiṃkarīṇām|| 41
अर्थ
हमसे यह बात छिपी नहीं है कि जैसे भगवान् नारायण देवताओंकी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम व्रजमण्डलका भय और दुःख मिटानेके लिये ही प्रकट हुए हो! और यह भी स्पष्ट ही है कि दीन-दुखियोंपर तुम्हारा बड़ा प्रेम, बड़ी कृपा है। प्रियतम! हम भी बड़ी दुःखिनी हैं। तुम्हारे मिलनकी आकांक्षाकी आगसे हमारा वक्षःस्थल जल रहा है। तुम अपनी इन दासियोंके वक्षःस्थल और सिरपर अपने कोमल करकमल रखकर इन्हें अपना लो; हमें जीवनदान दो॥ ४१॥