na pāraye'haṃ calituṃ naya māṃ yatra te manaḥ|| 38
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा और शंकरके भी शासक हैं। वह गोपी वनमें जाकर अपने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाली हो गयी और उन्हीं श्रीकृष्णसे कहने लगी—‘प्यारे! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता। मेरे सुकुमार पाँव थक गये हैं। अब तुम जहाँ चलना चाहो, मुझे अपने कंधेपर चढ़ाकर ले चलो’॥ ३८॥
ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत्।
न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः॥ ३८
भगवान् श्रीकृष्ण ब्रह्मा और शंकरके भी शासक हैं। वह गोपी वनमें जाकर अपने प्रेम और सौभाग्यके मदसे मतवाली हो गयी और उन्हीं श्रीकृष्णसे कहने लगी—‘प्यारे! मुझसे अब तो और नहीं चला जाता। मेरे सुकुमार पाँव थक गये हैं। अब तुम जहाँ चलना चाहो, मुझे अपने कंधेपर चढ़ाकर ले चलो’॥ ३८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.30.38 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 322) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/30/38/