श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

भजन्त्यभजतो ये वै करुणाः पितरो यथा।

धर्मो निरपवादोऽत्र सौहृदं च सुमध्यमाः॥ १८

bhajantyabhajato ye vai karuṇāḥ pitaro yathā|

dharmo nirapavādo'tra sauhṛdaṃ ca sumadhyamāḥ|| 18

अर्थ

सुन्दरियो! जो लोग प्रेम न करनेवालेसे भी प्रेम करते हैं—जैसे स्वभावसे ही करुणाशील सज्जन और माता-पिता—उनका हृदय सौहार्दसे, हितैषितासे भरा रहता है और सच पूछो, तो उनके व्यवहारमें निश्छल सत्य एवं पूर्ण धर्म भी है॥ १८॥✎ 1668 2089

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1668 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालोंसे → करनेवालोंसे
  • #2089 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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