श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.32.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 32 · अथ द्वात्रिंशोऽध्यायः

भजतोऽपि न वै केचिद् भजन्त्यभजतः कुतः।

आत्मारामा ह्याप्तकामा अकृतज्ञा गुरुद्रुहः॥ १९

bhajato'pi na vai kecid bhajantyabhajataḥ kutaḥ|

ātmārāmā hyāptakāmā akṛtajñā gurudruhaḥ|| 19

अर्थ

कुछ लोग ऐसे होते हैं, जो प्रेम करनेवालोंसे भी प्रेम नहीं करते, न प्रेम करनेवालोंका तो उनके सामने कोई प्रश्‍न ही नहीं है। ऐसे लोग चार प्रकारके होते हैं। एक तो वे, जो अपने स्वरूपमें ही मस्त रहते हैं— जिनकी दृष्टिमें कभी द्वैत भासता ही नहीं। दूसरे वे, जिन्हें द्वैत तो भासता है, परन्तु जो कृतकृत्य हो चुके हैं; उनका किसीसे कोई प्रयोजन ही नहीं है। तीसरे वे हैं, जो जानते ही नहीं कि हमसे कौन प्रेम करता है; और चौथे वे हैं, जो जान-बूझकर अपना हित करनेवाले परोपकारी गुरुतुल्य लोगोंसे भी द्रोह करते हैं, उनको सताना चाहते हैं॥ १९॥✎ 1668 2089

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1668 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: करने-वालोंसे → करनेवालोंसे
  • #2089 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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