श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.33.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 33 · अथ त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः

तत्रैकांसगतं बाहुं कृष्णस्योत्पलसौरभम्।

चन्दनालिप्तमाघ्राय हृष्टरोमा चुचुम्ब ह॥ १२

tatraikāṃsagataṃ bāhuṃ kṛṣṇasyotpalasaurabham|

candanāliptamāghrāya hṛṣṭaromā cucumba ha|| 12

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्णने अपना एक हाथ दूसरी गोपीके कंधेपर रख रखा था। वह स्वभावसे तो कमलके समान सुगन्धसे युक्त था ही, उसपर बड़ा सुगन्धित चन्दनका लेप भी था। उसकी सुगन्धसे वह गोपी पुलकित हो गयी, उसका रोम-रोम खिल उठा। उसने झटसे उसे चूम लिया॥ १२॥✎ 2090

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