श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

सर्प उवाच

अहं विद्याधरः कश्‍चित् सुदर्शन इति श्रुतः।

श्रिया स्वरूपसम्पत्त्या विमानेनाचरं दिशः॥ १२

ahaṃ vidyādharaḥ kaścit sudarśana iti śrutaḥ|

śriyā svarūpasampattyā vimānenācaraṃ diśaḥ|| 12

अर्थ

अजगरके शरीरसे निकला हुआ पुरुष बोला—भगवन्! मैं पहले एक विद्याधर था। मेरा नाम था सुदर्शन। मेरे पास सौन्दर्य तो था ही, लक्ष्मी भी बहुत थी। इससे मैं विमानपर चढ़कर यहाँ-से-वहाँ घूमता रहता था॥ १२॥

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