एक दिन मैंने अंगिरा गोत्रके कुरूप ऋषियोंको देखा। अपने सौन्दर्यके घमंडसे मैंने उनकी हँसी उड़ायी। मेरे इस अपराधसे कुपित होकर उन लोगोंने मुझे अजगरयोनिमें जानेका शाप दे दिया। यह मेरे पापोंका ही फल था॥ १३॥
ऋषीन् विरूपानंगिरसः प्राहसं रूपदर्पितः।
तैरिमां प्रापितो योनिं प्रलब्धैः स्वेन पाप्मना॥ १३
एक दिन मैंने अंगिरा गोत्रके कुरूप ऋषियोंको देखा। अपने सौन्दर्यके घमंडसे मैंने उनकी हँसी उड़ायी। मेरे इस अपराधसे कुपित होकर उन लोगोंने मुझे अजगरयोनिमें जानेका शाप दे दिया। यह मेरे पापोंका ही फल था॥ १३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.13 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 348) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/34/13/