श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

तं त्वाहं भवभीतानां प्रपन्‍नानां भयापहम्।

आपृच्छे शापनिर्मुक्तः पादस्पर्शादमीवहन्॥ १५

taṃ tvāhaṃ bhavabhītānāṃ prapannānāṃ bhayāpaham|

āpṛcche śāpanirmuktaḥ pādasparśādamīvahan|| 15

अर्थ

समस्त पापोंका नाश करनेवाले प्रभो! जो लोग जन्म-मृत्युरूप संसारसे भयभीत होकर आपके चरणोंकी शरण ग्रहण करते हैं, उन्हें आप समस्त भयोंसे मुक्त कर देते हैं। अब मैं आपके श्रीचरणोंके स्पर्शसे शापसे छूट गया हूँ और अपने लोकमें जानेकी अनुमति चाहता हूँ॥ १५॥

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