॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.34.17
ब्रह्मदण्डाद् विमुक्तोऽहं सद्यस्तेऽच्युत दर्शनात्।
यन्नाम गृह्णन्नखिलान् श्रोतॄनात्मानमेव च।✎ 1158
सद्यः पुनाति किं भूयस्तस्य स्पृष्टः पदा हि ते॥ १७
brahmadaṇḍād vimukto'haṃ sadyaste'cyuta darśanāt|
yannāma gṛhṇannakhilān śrotṝnātmānameva ca|
sadyaḥ punāti kiṃ bhūyastasya spṛṣṭaḥ padā hi te|| 17
अर्थ
अपने स्वरूपमें नित्य-निरन्तर एकरस रहनेवाले अच्युत! आपके दर्शनमात्रसे मैं ब्राह्मणोंके शापसे मुक्त हो गया, यह कोई आश्चर्यकी बात नहीं है; क्योंकि जो पुरुष आपके नामोंका उच्चारण करता है, वह अपने-आपको और समस्त श्रोताओंको भी तुरंत पवित्र कर देता है। फिर मुझे तो आपने स्वयं अपने चरणकमलोंसे स्पर्श किया है। तब भला, मेरी मुक्तिमें क्या सन्देह हो सकता है?॥ १७॥