कुछ ही दूर जानेपर भगवान्ने उसे पकड़ लिया और उस दुष्टके सिरपर कसकर एक घूँसा जमाया और चूड़ामणिके साथ उसका सिर भी धड़से अलग कर दिया॥ ३१॥
अविदूर इवाभ्येत्य शिरस्तस्य दुरात्मनः।
जहार मुष्टिनैवाङ्ग सहचूडामणिं विभुः॥ ३१
कुछ ही दूर जानेपर भगवान्ने उसे पकड़ लिया और उस दुष्टके सिरपर कसकर एक घूँसा जमाया और चूड़ामणिके साथ उसका सिर भी धड़से अलग कर दिया॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.34.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 350) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/34/31/