श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

शंखचूडं निहत्यैवं मणिमादाय भास्वरम्।

अग्रजायाददात् प्रीत्या पश्यन्तीनां च योषिताम्॥ ३२

śaṃkhacūḍaṃ nihatyaivaṃ maṇimādāya bhāsvaram|

agrajāyādadāt prītyā paśyantīnāṃ ca yoṣitām|| 32

अर्थ

इस प्रकार भगवान् श्रीकृष्ण शंखचूडको मारकर और वह चमकीली मणि लेकर लौट आये तथा सब गोपियोंके सामने ही उन्होंने बड़े प्रेमसे वह मणि बड़े भाई बलरामजीको दे दी॥ ३२॥

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायां दशमस्कन्धे पूर्वार्धे
शंखचूडवधो नाम चतुस्त्रिंशोऽध्यायः॥ ३४॥

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