श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.34.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 34 · अथ चतुस्त्रिंशोऽध्यायः

स वै भगवतः श्रीमत्पादस्पर्शहताशुभः।

भेजे सर्पवपुर्हित्वा रूपं विद्याधरार्चितम्॥ ९

sa vai bhagavataḥ śrīmatpādasparśahatāśubhaḥ|

bheje sarpavapurhitvā rūpaṃ vidyādharārcitam|| 9

अर्थ

भगवान्‌के श्रीचरणोंका स्पर्श होते ही अजगरके सारे अशुभ भस्म हो गये और वह उसी क्षण अजगरका शरीर छोड़कर विद्याधरार्चित सर्वांगसुन्दर रूपवान् बन गया॥ ९॥✎ 1670 2092

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1670 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सर्वांग-सुन्दर → सर्वांगसुन्दर
  • #2092 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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