श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

महामात्र त्वया भद्र रङ्गद्वार्युपनीयताम्।

द्विपः कुवलयापीडो जहि तेन ममाहितौ॥ २५

mahāmātra tvayā bhadra raṅgadvāryupanīyatām|

dvipaḥ kuvalayāpīḍo jahi tena mamāhitau|| 25

अर्थ

महावत! तुम बड़े चतुर हो। देखो भाई! तुम दंगलके घेरेके फाटकपर ही अपने कुवलयापीड हाथीको रखना और जब मेरे शत्रु उधरसे निकलें, तब उसीके द्वारा उन्हें मरवा डालना॥ २५॥

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