श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.11

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

कृष्ण कृष्णाप्रमेयात्मन् योगेश जगदीश्‍वर।

वासुदेवाखिलावास सात्वतां प्रवर प्रभो॥ ११

kṛṣṇa kṛṣṇāprameyātman yogeśa jagadīśvara|

vāsudevākhilāvāsa sātvatāṃ pravara prabho|| 11

अर्थ

‘सच्चिदानन्दस्वरूप श्रीकृष्ण! आपका स्वरूप मन और वाणीका विषय नहीं है। आप योगेश्‍वर हैं। सारे जगत‍्का नियन्त्रण आप ही करते हैं। आप सबके हृदयमें निवास करते हैं और सब-के-सब आपके हृदयमें निवास करते हैं। आप भक्तोंके एकमात्र वांछनीय, यदुवंशशिरोमणि और हमारे स्वामी हैं॥ ११॥✎ 1921 2093 2094

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (3)
  • #1921 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): यदुवंश-शिरोमणि → यदुवंशशिरोमणि
  • #2093 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि
  • #2094 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डे़ → ड़े

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