मेरे अहोभाग्य! जब मैं उनके चरण-कमलोंमें गिर जाऊँगा, तब क्या वे अपना करकमल मेरे सिरपर रख देंगे? उनके वे करकमल उन लोगोंको सदाके लिये अभयदान दे चुके हैं, जो कालरूपी साँपके भयसे अत्यन्त घबड़ाकर उनकी शरण चाहते और शरणमें आ जाते हैं॥ १६॥✎ 1920
अप्यङ्घ्रिमूले पतितस्य मे विभुः
शिरस्यधास्यन्निजहस्तपंकजम् ।
दत्ताभयं कालभुजंगरंहसा
प्रोद्वेजितानां शरणैषिणां नृणाम्॥ १६
मेरे अहोभाग्य! जब मैं उनके चरण-कमलोंमें गिर जाऊँगा, तब क्या वे अपना करकमल मेरे सिरपर रख देंगे? उनके वे करकमल उन लोगोंको सदाके लिये अभयदान दे चुके हैं, जो कालरूपी साँपके भयसे अत्यन्त घबड़ाकर उनकी शरण चाहते और शरणमें आ जाते हैं॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 369) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1920 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): वक्ष:-स्थलपर → वक्षःस्थलपर