मैं उनके सामने विनीत भावसे सिर झुकाकर खड़ा हो जाऊँगा और बलरामजी मुसकराते हुए मुझे अपने हृदयसे लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर मुझे घरके भीतर ले जायँगे। वहाँ सब प्रकारसे मेरा सत्कार करेंगे। इसके बाद मुझसे पूछेंगे कि ‘कंस हमारे घरवालोंके साथ कैसा व्यवहार करता है?’॥ २३॥
किंचाग्रजो मावनतं यदूत्तमः
स्मयन् परिष्वज्य गृहीतमंजलौ।
गृहं प्रवेश्याप्तसमस्तसत्कृतं
संप्रक्ष्यते कंसकृतं स्वबन्धुषु॥ २३
मैं उनके सामने विनीत भावसे सिर झुकाकर खड़ा हो जाऊँगा और बलरामजी मुसकराते हुए मुझे अपने हृदयसे लगा लेंगे और फिर मेरे दोनों हाथ पकड़कर मुझे घरके भीतर ले जायँगे। वहाँ सब प्रकारसे मेरा सत्कार करेंगे। इसके बाद मुझसे पूछेंगे कि ‘कंस हमारे घरवालोंके साथ कैसा व्यवहार करता है?’॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 370) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/23/