॥ श्रीहरिः ॥
इति सञ्चिन्तयन् कृष्णं श्वफल्कतनयोऽध्वनि।✎ 1165
रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्चास्तगिरिं नृप॥ २४
iti sañcintayan kṛṣṇaṃ śvaphalkatanayo'dhvani|
rathena gokulaṃ prāptaḥ sūryaścāstagiriṃ nṛpa|| 24
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! श्वफल्क-नन्दन अक्रूर मार्गमें इसी चिन्तनमें डूबे-डूबे रथसे नन्द-गाँव पहुँच गये और सूर्य अस्ताचलपर चले गये॥ २४॥
इति सञ्चिन्तयन् कृष्णं श्वफल्कतनयोऽध्वनि।
रथेन गोकुलं प्राप्तः सूर्यश्चास्तगिरिं नृप॥ २४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! श्वफल्क-नन्दन अक्रूर मार्गमें इसी चिन्तनमें डूबे-डूबे रथसे नन्द-गाँव पहुँच गये और सूर्य अस्ताचलपर चले गये॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.38.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 370) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/38/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
- #1165 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): संञ्चिन्तयन् → सञ्चिन्तयन्